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झूठे आरोप और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दुरुपयोग न्याय के लिए खतरा- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में फर्जी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जरिए तैयार किए जा रहे साक्ष्यों पर कड़ी चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि दांपत्य संबंधों में तनाव बढ़ते ही कई मामलों में एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने की सोच हावी हो जाती है, जिसके चलते झूठे आरोप लगाए जाते हैं और तकनीक का सहारा लेकर नकली सबूत तक गढ़े जा रहे हैं। अदालत ने इसे न्यायिक प्रक्रिया के लिए गंभीर चुनौती बताया है।

AI के दुरुपयोग से बढ़ रही न्यायिक मुश्किलें
न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने एक वैवाहिक विवाद का निपटारा करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि आधुनिक तकनीक, विशेषकर AI, ने झूठे साक्ष्य तैयार करना बेहद आसान बना दिया है, जिससे अदालतों के सामने सच्चाई तक पहुंचना कठिन होता जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के कृत्य न केवल कानून का दुरुपयोग हैं, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुंचाते हैं।

हर विवाद में पुलिस का सहारा लेने पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक मामलों में छोटी-छोटी बातों पर पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की प्रवृत्ति पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि कई बार विवाद होते ही यह सोच बना ली जाती है कि दूसरे पक्ष को किसी भी हाल में सबक सिखाना है। इसके चलते कानूनी लड़ाइयों की शुरुआत हो जाती है, जो समय के साथ और अधिक जटिल रूप ले लेती हैं।

मध्यस्थता और काउंसलिंग पर दिया जोर
पीठ ने सुझाव दिया कि वैवाहिक विवादों में सबसे पहले मध्यस्थता और सुलह के प्रयास किए जाने चाहिए। अदालत ने कहा कि वकीलों के मार्गदर्शन में गंभीरता से मध्यस्थता की कोशिश होनी चाहिए और जहां आवश्यक हो, वहां काउंसलिंग को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अदालत का मानना है कि इससे कई मामलों में रिश्तों को टूटने से बचाया जा सकता है।

गिरफ्तारी से बिगड़ते हैं हालात
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि साधारण वैवाहिक विवादों में गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई कई बार हालात को और खराब कर देती है। अदालत ने कहा कि चाहे गिरफ्तारी एक दिन के लिए ही क्यों न हो, वह अक्सर सुलह और पुनर्मिलन की संभावनाओं को समाप्त कर देती है। इसलिए पुलिस कार्रवाई से पहले विवाद सुलझाने के अन्य विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

लंबे समय से टूटे रिश्ते का मामला
इस फैसले में अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि संबंधित दंपति का विवाह 13 वर्षों से अधिक समय से पूरी तरह टूट चुका था। दोनों ने शादी के बाद केवल 65 दिन साथ बिताए थे, जबकि इसके बाद एक दशक से ज्यादा समय तक विभिन्न अदालतों में 40 से अधिक मुकदमे चलते रहे। इन मामलों में तलाक, भरण-पोषण, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न से जुड़े आपराधिक केस और अन्य कानूनी कार्यवाहियां शामिल थीं। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने विवाह को अपरिवर्तनीय रूप से टूट चुका मानते हुए उसे भंग कर दिया।

 

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